बिलासपुर। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की प्राथमिक जिम्मेदारी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, लेकिन इन दिनों विभागीय ऑनलाइन कामों और पोर्टल पर जानकारी दर्ज करने की बढ़ती जिम्मेदारियों के बीच शिक्षण कार्य प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। छात्रवृत्ति के आवेदन, विद्यार्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन, डिजिटल आईडी, विभिन्न योजनाओं की रिपोर्टिंग और ऑनलाइन प्रशिक्षण जैसे कामों ने शिक्षकों की दिनचर्या को काफी व्यस्त कर दिया है।
स्थिति यह है कि कक्षाओं में बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ शिक्षकों को कई डिजिटल प्रक्रियाएं भी तय समय-सीमा में पूरी करनी पड़ रही हैं। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था के सामने सवाल खड़ा हो रहा है कि शिक्षकों का अधिक समय ऑनलाइन औपचारिकताओं में बीतेगा, तो नियमित पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय कैसे निकलेगा?
20 से अधिक ऑनलाइन कामों की जिम्मेदारी
शिक्षकों को एपीएएआर आईडी, यू-डाइस 2026-27, पौधारोपण की तस्वीरें अपलोड करने और जियो टैगिंग, गणवेश एवं पाठ्यपुस्तक वितरण की जानकारी, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी), निपुण भारत, मध्यान्ह भोजन योजना, सरस्वती साइकिल योजना, परीक्षा परिणाम और पालक-शिक्षक बैठक की रिपोर्टिंग जैसे कई कार्य करने पड़ते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन प्रशिक्षण और विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित जानकारियां भी पोर्टलों पर दर्ज करनी होती हैं।
इन कार्यों का उद्देश्य योजनाओं की निगरानी और विद्यार्थियों तक सुविधाएं पहुंचाना है, लेकिन अलग-अलग पोर्टलों पर बार-बार जानकारी भरने और निर्धारित समय में रिपोर्ट जमा करने का दबाव शिक्षकों के लिए चुनौती बन रहा है। खासकर उन स्कूलों में परेशानी अधिक हो सकती है, जहां पहले से शिक्षकों की कमी है।
छात्रवृत्ति के आवेदन में दस्तावेजों का सत्यापन बड़ी चुनौती
पूर्व मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति के आवेदनों को पूरा करने के लिए विद्यार्थियों के जाति एवं आय प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, बैंक खाते, समग्र आईडी और अंकसूची सहित आवश्यक दस्तावेजों का मिलान करना पड़ता है। दस्तावेजों में त्रुटि, जानकारी की कमी या अभिभावकों से समय पर कागजात नहीं मिलने की स्थिति में आवेदन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा इंटरनेट और पोर्टल से जुड़ी तकनीकी समस्याएं भी काम में देरी का कारण बन सकती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 16 अक्टूबर को जारी आदेश में संबंधित कार्यों को पूरा करने के लिए 19 अक्टूबर तक की समय-सीमा दिए जाने और समय पर काम पूरा नहीं होने की स्थिति में वेतन रोकने की चेतावनी का उल्लेख किया गया है। कम समय में दस्तावेज जुटाने, उनका सत्यापन करने और आवेदन पूरा करने की चुनौती ने शिक्षकों की चिंता बढ़ाई है।
हालांकि, किसी भी कार्य में देरी के लिए जिम्मेदारी तय करने से पहले यह देखना भी जरूरी है कि समस्या संबंधित कर्मचारी की लापरवाही से हुई है या दस्तावेजों की अनुपलब्धता, तकनीकी बाधा अथवा दूसरे विभागों में लंबित प्रक्रिया इसकी वजह है।
जाति प्रमाण पत्र के लिए भी शिक्षकों को करनी पड़ रही मशक्कत
विद्यार्थियों के जाति प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया में भी शिक्षकों को अभिभावकों से संपर्क करने, जरूरी दस्तावेज जुटाने और आवेदन तैयार कराने में समय देना पड़ता है। शिक्षकों की शिकायतों के मुताबिक, आवेदन तहसील या राजस्व कार्यालय तक पहुंचने के बाद उसकी स्थिति की जानकारी विद्यालयों को स्पष्ट रूप से नहीं मिल पाती। पुराने रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने पर कई बार दस्तावेज जुटाने और प्रक्रिया दोहराने की नौबत भी आती है।
ऐसे मामलों में शिक्षा विभाग और राजस्व विभाग के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। आवेदन की स्थिति, जारी प्रमाण पत्रों की संख्या और लंबित मामलों की जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध होने से अनावश्यक भागदौड़ कम की जा सकती है।
ऑनलाइन प्रशिक्षण और रिपोर्टिंग का भी दबाव
शिक्षकों को समय-समय पर ऑनलाइन प्रशिक्षण, निर्धारित मॉड्यूल पूरा करने और प्रमाण पत्र प्राप्त करने जैसे कार्य भी करने पड़ते हैं। प्रशिक्षण शिक्षण क्षमता बढ़ाने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसके लिए उचित समय और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
एक तरफ कक्षा में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ विभागीय पोर्टलों पर समय-सीमा के भीतर काम पूरा करने का दबाव होने से दोनों कार्यों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में विभागीय व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक है, ताकि डिजिटल कार्यों के कारण नियमित अध्यापन प्रभावित न हो।
शिक्षकों का समय बचाने के लिए व्यवस्था में बदलाव जरूरी
सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए शिक्षकों को गैर-शिक्षकीय कार्यों के अनावश्यक बोझ से राहत देने की जरूरत है। एक ही जानकारी को अलग-अलग पोर्टलों पर बार-बार दर्ज करने की व्यवस्था में सुधार किया जा सकता है। जहां संभव हो, विभिन्न पोर्टलों को एकीकृत करने और डेटा एंट्री के लिए अलग कर्मचारियों की व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही छात्रवृत्ति और जाति प्रमाण पत्र से संबंधित प्रक्रियाओं में शिक्षा एवं राजस्व विभाग की जिम्मेदारियां स्पष्ट होनी चाहिए। समय-सीमा में काम पूरा नहीं होने पर कार्रवाई से पहले वास्तविक कारणों की समीक्षा और संबंधित शिक्षक को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना भी महत्वपूर्ण है।
आखिरकार, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता केवल पोर्टल पर दर्ज आंकड़ों से नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और उनके सीखने के स्तर से तय होगी। डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य शिक्षकों का काम आसान बनाना और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करना होना चाहिए। यदि शिक्षक अपना अधिकांश समय ऑनलाइन प्रविष्टियों और विभागीय औपचारिकताओं में बिताने को मजबूर होंगे, तो कक्षा में बच्चों को पढ़ाने के लिए उपलब्ध समय पर असर पड़ना स्वाभाविक है।

