रायपुर। छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। प्रदेश के कई स्कूलों में विद्यार्थियों की परीक्षा लिए बिना ही उनकी मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए। मामला राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत पाठ्यक्रम में शामिल किए गए तीन नए विषयों से जुड़ा है। इस खुलासे के बाद शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और विद्यार्थियों के मूल्यांकन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

दरअसल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत सरकारी स्कूलों में शारीरिक शिक्षा, कला शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। शैक्षणिक सत्र 2024-25 में कक्षा तीसरी में शारीरिक शिक्षा और कला शिक्षा, जबकि छठवीं कक्षा में इन दोनों विषयों के साथ व्यावसायिक शिक्षा भी जोड़ी गई थी। इसके बाद शैक्षणिक सत्र 2025-26 में कक्षा चौथी और सातवीं में भी इन विषयों को लागू किया गया।

हैरानी की बात यह है कि इन विषयों के लिए पाठ्यपुस्तकें भी छपवाई गईं और स्कूलों तक पहुंचाई गईं, लेकिन कई जगह इनकी परीक्षा ही आयोजित नहीं की गई। इसके बावजूद विद्यार्थियों की मार्कशीट में ग्रेड दर्ज कर दिए गए।

11 जिलों के 50 स्कूलों की पड़ताल में सामने आई गड़बड़ी

मामले की पड़ताल के दौरान प्रदेश के 11 जिलों के 50 सरकारी स्कूलों की जानकारी जुटाई गई। इनमें रायपुर, महासमुंद, गरियाबंद, बलौदाबाजार, जांजगीर, जगदलपुर, बीजापुर, जशपुर, नारायणपुर, दुर्ग और धमतरी के स्कूल शामिल हैं।

जांच में कई शिक्षकों ने स्वीकार किया कि संबंधित विषयों की लिखित परीक्षा नहीं हुई थी। हालांकि, मार्कशीट में इन विषयों के नाम और ग्रेड भरने के लिए कॉलम पहले से मौजूद थे। ऐसे में शिक्षकों ने कॉलम खाली छोड़ने के बजाय विद्यार्थियों को ग्रेड दे दिए।

कुछ शिक्षकों का तर्क था कि आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को फेल नहीं किया जाता, इसलिए इन विषयों की परीक्षा नहीं होने से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।

66.96 लाख किताबें छपीं, फिर पढ़ाई और मूल्यांकन कहां हुआ?

इन तीनों विषयों का पाठ्यक्रम राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) ने तैयार किया है। जानकारी के मुताबिक, पाठ्यपुस्तक निगम ने दो शैक्षणिक सत्रों में करीब 66.96 लाख किताबें छापकर जिलों तक पहुंचाईं।

शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत खेल, योग, पोषण और स्वस्थ जीवनशैली की जानकारी दी जानी है। कला शिक्षा में संगीत, चित्रकला, रंगमंच और अन्य रचनात्मक गतिविधियां शामिल हैं। वहीं व्यावसायिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों को बागवानी, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैंकिंग और रिटेल जैसे क्षेत्रों से जुड़े व्यावहारिक कौशल सिखाने की योजना है।

लेकिन कई स्कूलों में इन विषयों के लिए प्रशिक्षित शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक नहीं थे और परीक्षाएं भी नहीं हुईं, तो विद्यार्थियों का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया?

DPI और जिला शिक्षा अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी

इस पूरे मामले में विभागीय समन्वय की कमी भी सामने आई है। बताया जा रहा है कि लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) को उम्मीद थी कि नए विषयों की परीक्षाएं भी अन्य विषयों की तरह जिला स्तर पर आयोजित की जाएंगी। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी DPI से स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलने का इंतजार करते रहे।

इस आपसी असमंजस का नतीजा यह हुआ कि कई स्कूलों में परीक्षा आयोजित नहीं हुई और मार्कशीट में ग्रेड दर्ज करने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई।

अधिकारियों ने भी उठाए सवाल

SCERT के उप संचालक एवं पाठ्यक्रम शाखा प्रभारी कौस्तुभ चटर्जी के मुताबिक, कला और योग जैसे विषयों को भी अन्य विषयों की तरह अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। उनकी किताबें भी स्कूलों तक पहुंचाई गई हैं। ऐसे में विद्यार्थियों का परिणाम परीक्षा और मूल्यांकन के आधार पर ही तैयार होना चाहिए।

वहीं लोक शिक्षण संचालनालय के उप संचालक अशोक बंजारा ने भी कहा कि जब विषय पाठ्यक्रम में शामिल हैं और उनकी किताबें स्कूलों को उपलब्ध कराई गई हैं, तो उनकी परीक्षा भी होनी चाहिए। उन्होंने इस संबंध में दोबारा स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करवाने की बात कही है।

अब सबसे बड़ा सवाल: जिम्मेदारी किसकी?

बिना परीक्षा के मार्कशीट में ग्रेड दर्ज किए जाने का यह मामला केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षणिक प्रगति के मूल्यांकन पर भी सवाल खड़े करता है। यदि किसी विषय को अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है, तो उसकी पढ़ाई, शिक्षक व्यवस्था और मूल्यांकन सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस मामले में क्या कदम उठाता है और बिना मूल्यांकन ग्रेड दर्ज करने की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाती है।