त्योहारों का मौसम है साहब! बाजार मिठाइयों से सजे हैं, दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ है और मिठाई के डिब्बों में अपनों के लिए खुशियां पैक की जा रही हैं। लेकिन इस खुशियों के बाजार में एक सवाल भी घूम रहा है— मिठाई शुद्ध है या उसके साथ मुफ्त में कुछ ऐसा भी मिल रहा है, जिसकी कीमत बाद में सेहत को चुकानी पड़ेगी?
मिलावटखोरों का भी क्या गजब का कारोबार है! जनता मिठाई खरीदते समय सोचती है कि बच्चों का मुंह मीठा कराएंगे, रिश्तेदारों को मिठाई खिलाएंगे और त्योहार की खुशियां बांटेंगे। लेकिन अगर मिठाई की गुणवत्ता पर ही सवाल खड़े होने लगें, तो ग्राहक मिठाई खाए या पहले डिब्बा खोलकर सीबीआई जांच शुरू कर दे! 😂
दुकानदार बड़े आत्मविश्वास से कहता है, “भाई साहब, एकदम बढ़िया माल है, आंख बंद करके ले जाइए!” अब ग्राहक भी क्या करे? आंख बंद करके मिठाई खरीद ले, लेकिन खाने के बाद आंखें खुलेंगी तो जिम्मेदारी किसकी होगी? मिठाई में काजू-बादाम कम निकल जाएं तो गनीमत है, लेकिन अगर खाद्य सुरक्षा पर ही सवाल खड़े हो जाएं, तो मामला हंसी-मजाक से आगे निकल जाता है।
इधर त्योहारों में मिठाइयों की मांग बढ़ती है, उधर खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर निगरानी की जरूरत भी बढ़ जाती है। ऐसे में अगर जांच के दौरान गंदगी, असुरक्षित रखरखाव या दूसरी गंभीर खामियां सामने आती हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नियमित निगरानी का इंतजाम कितना मजबूत है? क्या खाद्य सुरक्षा की याद सिर्फ त्योहारों पर छापेमारी के वक्त ही आती है? क्या मिलावटखोर भी कैलेंडर देखकर अपना कारोबार चलाते हैं और व्यवस्था भी त्योहार देखकर जागती है?
रायपुर में खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई के दौरान चार प्रतिष्ठानों के खाद्य लाइसेंस निलंबित किए जाने और बड़ी मात्रा में मिठाइयां व पनीर नष्ट कराए जाने की खबर सामने आई। अब सवाल यह है कि अगर जांच में ऐसी खामियां मिलीं, तो निगरानी का अगला कदम क्या होगा? कार्रवाई के बाद नियमित निरीक्षण होगा या फिर कुछ दिन बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर लौट जाएगा?
कुंभकर्ण की नींद का किस्सा तो आपने सुना ही होगा, लेकिन जनता की परेशानी यह है कि व्यवस्था को जगाने के लिए आखिर कितनी शिकायतें करनी पड़ेंगी? अधिकारी कार्रवाई करें, यह अच्छी बात है; लेकिन ऐसी नौबत ही कम आए, यह उससे भी अच्छी बात है। क्योंकि छापेमारी के बाद मिठाई नष्ट कर देना एक कदम है, जबकि मिलावट और अस्वच्छता को पनपने से रोकना असली चुनौती है।
और हां, ईमानदारी से कारोबार करने वाले सभी दुकानदारों को एक ही तराजू में तौलना भी ठीक नहीं। जो व्यापारी शुद्धता और साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं, उन्हें प्रोत्साहन मिलना चाहिए। लेकिन जो नियमों की अनदेखी करते हैं, उनके खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई होनी चाहिए। खाद्य सुरक्षा के मामले में न त्योहार का बहाना चलना चाहिए और न कारोबार का दबाव।
आखिर आम आदमी मिठाई खरीदते समय प्रयोगशाला की रिपोर्ट तो साथ लेकर नहीं चलता। वह दुकानदार के भरोसे और प्रशासन की निगरानी के भरोसे सामान खरीदता है। इसलिए सुरक्षित खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराना केवल ग्राहक की सावधानी का मामला नहीं, बल्कि कारोबारियों की जिम्मेदारी और प्रशासन की जवाबदेही भी है।
त्योहार खुशियां बांटने के लिए हैं, बीमारियों का डर बांटने के लिए नहीं। मिठाई में मिठास होनी चाहिए, मिलावट का संदेह नहीं। अब खाद्य विभाग को भी यह साबित करना होगा कि उसकी कार्रवाई सिर्फ त्योहारों की सुर्खियां बनने तक सीमित नहीं, बल्कि जनता की सेहत की सुरक्षा के लिए लगातार जारी रहने वाली व्यवस्था है।
क्योंकि भाई साहब, त्योहार है तो मिठाई जरूर खाइए, लेकिन मिलावट को यह कहकर माफ मत कीजिए कि “त्योहार है भाई, थोड़ी मिलावट तो चलती है!”

