बिलासपुर। विवाह में सात फेरे नहीं होने पर क्या शादी को सीधे अवैध घोषित कराया जा सकता है? इस सवाल पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सप्तपदी यानी सात फेरे नहीं होने के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित नहीं कराया जा सकता। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सात फेरों या अन्य आवश्यक वैवाहिक रस्मों के बिना हर विवाह स्वतः वैध माना जाएगा।

यह मामला प्रेम संबंध, मंदिर में विवाह और उसके बाद पति-पत्नी के बीच उत्पन्न विवाद से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए पति की विवाह को शून्य घोषित करने की याचिका भी खारिज कर दी।

फेसबुक से शुरू हुआ प्रेम संबंध, मंदिर में हुआ विवाह

मामले के अनुसार, राजाबाबू कश्यप और मोनिका कश्यप की मुलाकात फेसबुक के माध्यम से हुई थी। दोनों के बीच प्रेम संबंध बने और विवाह की बात आगे बढ़ी। पति राजाबाबू का आरोप था कि 3 फरवरी 2022 को उसे मोनिका के घर बुलाया गया और शादी करने के लिए दबाव बनाया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसे आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी दी गई थी।

इसके बाद 4 फरवरी 2022 को चिरमिरी के शिव मंदिर में दोनों का विवाह कराया गया। बाद में वैवाहिक संबंधों में विवाद उत्पन्न हो गया। पति ने अदालत में दलील दी कि विवाह के दौरान हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार सप्तपदी की रस्म पूरी नहीं हुई थी। इसी आधार पर उसने विवाह को शून्य घोषित करने की मांग की।

दूसरी ओर, पत्नी ने पति के आरोपों का विरोध किया। उसका कहना था कि विवाह के बाद दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रहे। पत्नी ने आरोप लगाया कि बाद में पति ने उसे घर से निकाल दिया और अब भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए विवाह को शून्य घोषित कराना चाहता है।

हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं की व्याख्या की

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने की। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 7 और धारा 11 के प्रावधानों पर विचार किया।

धारा 7 के अनुसार, हिंदू विवाह संबंधित पक्षों में से किसी के प्रचलित रीति-रिवाजों और रस्मों के अनुसार संपन्न किया जाता है। जहां सप्तपदी विवाह की आवश्यक रस्म है, वहां सातवां कदम पूरा होने पर विवाह पूर्ण और बाध्यकारी होता है।

वहीं, धारा 11 में उन परिस्थितियों का प्रावधान है, जिनमें विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है। इनमें विवाह के समय पहले से जीवित पति या पत्नी होना, प्रतिबंधित रिश्ते में विवाह करना तथा निषिद्ध सपिंड संबंध में विवाह करना शामिल है, बशर्ते लागू प्रथा इसकी अनुमति न देती हो।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सप्तपदी नहीं होने को धारा 11 के तहत विवाह शून्य घोषित करने का स्वतंत्र आधार नहीं बनाया जा सकता। यानी विवाह की आवश्यक रस्मों से जुड़ा सवाल और धारा 11 के अंतर्गत विवाह को शून्य घोषित करने के कानूनी आधार अलग-अलग विषय हैं।

फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त, पति को भी नहीं मिली राहत

हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट को सबसे पहले यह विचार करना चाहिए था कि विवाह को शून्य घोषित करने के लिए धारा 11 के तहत दायर याचिका सुनवाई योग्य थी या नहीं। इसके बजाय फैमिली कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए याचिका खारिज कर दी थी।

खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि, इससे पति को विवाह शून्य घोषित कराने की राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 11 के तहत मांगी गई राहत इस मामले में नहीं दी जा सकती और पति की मूल याचिका भी खारिज कर दी गई।

क्या इस फैसले के बाद सात फेरों के बिना भी शादी वैध मानी जाएगी?

इस फैसले को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने सात फेरों के बिना होने वाले हर विवाह को वैध घोषित नहीं किया है। अदालत ने मुख्य रूप से यह स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत विवाह को शून्य घोषित करने के लिए कानून में निर्धारित आधारों का होना जरूरी है।

किसी विवाह में आवश्यक धार्मिक रस्में पूरी हुई थीं या नहीं, विवाह किस प्रचलित परंपरा के अनुसार संपन्न हुआ और संबंधित मामले में कौन-से कानूनी प्रावधान लागू होते हैं—इन सवालों का परीक्षण परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है।

इसलिए इस फैसले का अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि विवाह की आवश्यक रस्में पूरी किए बिना हर शादी अपने आप वैध हो जाएगी।