बिलासपुर। सड़क हादसे में अपने परिजन को खोने वाले परिवार को मुआवजे के लिए अब तक इंतजार करना पड़ रहा है। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा एक करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश जारी किए जाने के बावजूद राशि जमा नहीं की गई। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंजाब रोडवेज की बस के मालिक की ओर से दायर अपील में हुई 389 दिनों की देरी को माफ तो कर दिया, लेकिन राहत के साथ सख्त शर्तें भी लगा दीं। अदालत ने 38 हजार रुपये का खर्च देने और अंतरिम राहत के लिए 30 दिनों के भीतर मुआवजे की 50 प्रतिशत राशि जमा करने का निर्देश दिया है।

2019 के सड़क हादसे से जुड़ा है मामला

यह मामला 14 अक्टूबर 2019 को हुए एक सड़क हादसे से संबंधित है। हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, जिसके बाद मृतक के परिजनों ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण का दरवाजा खटखटाया। ऐसे मामलों में मृतक के आश्रितों को आर्थिक सहायता दिलाने का उद्देश्य परिवार को हुए नुकसान की भरपाई करना होता है।

मामले की सुनवाई के बाद मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 22 फरवरी 2025 को मुआवजे के संबंध में आदेश पारित किया। अधिकरण ने मृतक के परिजनों को 1 करोड़ 9 हजार 160 रुपये देने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही निर्धारित मुआवजा राशि पर छह प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी आदेश दिया गया था।

हालांकि, आदेश के बाद भी मुआवजे की राशि जमा नहीं की गई। ऐसे में मृतक के परिवार के लिए कानूनी आदेश के बावजूद वास्तविक आर्थिक राहत का इंतजार बना रहा।

मुआवजा आदेश के खिलाफ 389 दिन की देरी से अपील

मुआवजा आदेश को चुनौती देने के लिए पंजाब रोडवेज की बस के मालिक की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। यह अपील 22 जून 2026 को दाखिल की गई, जबकि इसे निर्धारित समय के भीतर पेश नहीं किया गया था। अपील दायर करने में कुल 389 दिनों की देरी हुई।

इस देरी को माफ कराने के लिए अदालत के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया। अदालत के सामने एक ओर अपील दाखिल करने में हुई देरी का सवाल था, तो दूसरी ओर यह तथ्य भी था कि मुआवजा दिए जाने के आदेश के बावजूद दावेदारों को अब तक राशि नहीं मिली थी।

हाईकोर्ट ने देरी माफ की, लेकिन लगाई शर्तें

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने की। हाईकोर्ट ने अपील दायर करने में हुई देरी को माफ कर दिया, जिससे अपील पर आगे सुनवाई का रास्ता खुल गया। हालांकि, अदालत ने देरी माफ करने को बिना शर्त राहत में नहीं बदला।

अदालत ने अपीलकर्ता पक्ष पर 38 हजार रुपये का खर्च लगाया। निर्देश के अनुसार, यह राशि 30 दिनों के भीतर चेक के माध्यम से किसी एक दावेदार को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष दी जानी है।

इसके अलावा, अंतरिम राहत प्राप्त करने के लिए कुल मुआवजा राशि का 50 प्रतिशत भी 30 दिनों के भीतर जमा करना होगा। यह शर्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पालन के बाद ही शेष मुआवजे की वसूली पर रोक से संबंधित राहत लागू होगी।

मुआवजे की आधी राशि जमा करने पर जोर

हाईकोर्ट के निर्देश का व्यावहारिक अर्थ यह है कि अपीलकर्ता पक्ष केवल देरी माफ करा लेने के आधार पर मुआवजे की वसूली से राहत नहीं पा सकता। उसे अदालत द्वारा तय शर्तों का पालन करना होगा और निर्धारित अवधि में मुआवजे की आधी राशि जमा करनी होगी।

अदालत ने दावेदारों को जमा की गई राशि निकालने की अनुमति भी दी है। हालांकि, इसके लिए उन्हें लिखित आश्वासन देना होगा कि भविष्य में यदि अदालत के आदेश से रकम लौटाने की आवश्यकता पड़ती है, तो वे राशि वापस करेंगे।

इस व्यवस्था से एक तरफ अपीलकर्ता को कानूनी चुनौती जारी रखने का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी तरफ मृतक के परिजनों को मुआवजे की राशि तक पहुंच बनाने का रास्ता भी मिलता है।

अगली सुनवाई में जमा राशि का देना होगा प्रमाण

अदालत ने अपीलकर्ता पक्ष को अगली सुनवाई में 38 हजार रुपये के खर्च और मुआवजे की आधी राशि जमा किए जाने से संबंधित रसीद प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले में बस चालक सहित अन्य पक्षकारों को दोबारा नोटिस जारी करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

अब आगे की कार्यवाही में यह महत्वपूर्ण होगा कि निर्धारित 30 दिनों की अवधि में अदालत की शर्तों का पालन किया जाता है या नहीं। मुआवजे की राशि जमा होने और आगे की सुनवाई के बाद ही मामले की अगली स्थिति स्पष्ट होगी।

कानूनी आदेश के बाद भी राहत का इंतजार क्यों?

यह मामला सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार के लिए मुआवजे की अहमियत को सामने लाता है। किसी परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद आर्थिक सहायता केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका और भविष्य से भी जुड़ी होती है।

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा मुआवजा निर्धारित किए जाने के बावजूद यदि राशि समय पर नहीं मिलती, तो प्रभावित परिवार को वास्तविक राहत के लिए अतिरिक्त इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसे में हाईकोर्ट की ओर से अपीलकर्ता पक्ष पर खर्च लगाने और मुआवजे की आधी राशि जमा करने की शर्त रखने को इस मामले की महत्वपूर्ण कार्यवाही माना जा रहा है।

फिलहाल, हाईकोर्ट ने अपील में हुई देरी माफ कर सुनवाई का रास्ता खोला है, लेकिन मुआवजे के भुगतान से जुड़ी शर्तें भी तय की हैं। इसे पूरे मुआवजे के भुगतान या अपील के अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मृतक के परिजनों को पूरी राशि कब मिलेगी, यह आगे की न्यायिक कार्यवाही और अदालत के निर्देशों के अनुपालन पर निर्भर करेगा।

बिलासपुर। सड़क हादसे में अपने परिजन को खोने वाले परिवार को मुआवजे के लिए अब तक इंतजार करना पड़ रहा है। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा एक करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश जारी किए जाने के बावजूद राशि जमा नहीं की गई। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंजाब रोडवेज की बस के मालिक की ओर से दायर अपील में हुई 389 दिनों की देरी को माफ तो कर दिया, लेकिन राहत के साथ सख्त शर्तें भी लगा दीं। अदालत ने 38 हजार रुपये का खर्च देने और अंतरिम राहत के लिए 30 दिनों के भीतर मुआवजे की 50 प्रतिशत राशि जमा करने का निर्देश दिया है।

2019 के सड़क हादसे से जुड़ा है मामला

यह मामला 14 अक्टूबर 2019 को हुए एक सड़क हादसे से संबंधित है। हादसे में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, जिसके बाद मृतक के परिजनों ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण का दरवाजा खटखटाया। ऐसे मामलों में मृतक के आश्रितों को आर्थिक सहायता दिलाने का उद्देश्य परिवार को हुए नुकसान की भरपाई करना होता है।

मामले की सुनवाई के बाद मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने 22 फरवरी 2025 को मुआवजे के संबंध में आदेश पारित किया। अधिकरण ने मृतक के परिजनों को 1 करोड़ 9 हजार 160 रुपये देने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही निर्धारित मुआवजा राशि पर छह प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी आदेश दिया गया था।

हालांकि, आदेश के बाद भी मुआवजे की राशि जमा नहीं की गई। ऐसे में मृतक के परिवार के लिए कानूनी आदेश के बावजूद वास्तविक आर्थिक राहत का इंतजार बना रहा।

मुआवजा आदेश के खिलाफ 389 दिन की देरी से अपील

मुआवजा आदेश को चुनौती देने के लिए पंजाब रोडवेज की बस के मालिक की ओर से हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। यह अपील 22 जून 2026 को दाखिल की गई, जबकि इसे निर्धारित समय के भीतर पेश नहीं किया गया था। अपील दायर करने में कुल 389 दिनों की देरी हुई।

इस देरी को माफ कराने के लिए अदालत के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया गया। अदालत के सामने एक ओर अपील दाखिल करने में हुई देरी का सवाल था, तो दूसरी ओर यह तथ्य भी था कि मुआवजा दिए जाने के आदेश के बावजूद दावेदारों को अब तक राशि नहीं मिली थी।

हाईकोर्ट ने देरी माफ की, लेकिन लगाई शर्तें

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल ने की। हाईकोर्ट ने अपील दायर करने में हुई देरी को माफ कर दिया, जिससे अपील पर आगे सुनवाई का रास्ता खुल गया। हालांकि, अदालत ने देरी माफ करने को बिना शर्त राहत में नहीं बदला।

अदालत ने अपीलकर्ता पक्ष पर 38 हजार रुपये का खर्च लगाया। निर्देश के अनुसार, यह राशि 30 दिनों के भीतर चेक के माध्यम से किसी एक दावेदार को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष दी जानी है।

इसके अलावा, अंतरिम राहत प्राप्त करने के लिए कुल मुआवजा राशि का 50 प्रतिशत भी 30 दिनों के भीतर जमा करना होगा। यह शर्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके पालन के बाद ही शेष मुआवजे की वसूली पर रोक से संबंधित राहत लागू होगी।

मुआवजे की आधी राशि जमा करने पर जोर

हाईकोर्ट के निर्देश का व्यावहारिक अर्थ यह है कि अपीलकर्ता पक्ष केवल देरी माफ करा लेने के आधार पर मुआवजे की वसूली से राहत नहीं पा सकता। उसे अदालत द्वारा तय शर्तों का पालन करना होगा और निर्धारित अवधि में मुआवजे की आधी राशि जमा करनी होगी।

अदालत ने दावेदारों को जमा की गई राशि निकालने की अनुमति भी दी है। हालांकि, इसके लिए उन्हें लिखित आश्वासन देना होगा कि भविष्य में यदि अदालत के आदेश से रकम लौटाने की आवश्यकता पड़ती है, तो वे राशि वापस करेंगे।

इस व्यवस्था से एक तरफ अपीलकर्ता को कानूनी चुनौती जारी रखने का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी तरफ मृतक के परिजनों को मुआवजे की राशि तक पहुंच बनाने का रास्ता भी मिलता है।

अगली सुनवाई में जमा राशि का देना होगा प्रमाण

अदालत ने अपीलकर्ता पक्ष को अगली सुनवाई में 38 हजार रुपये के खर्च और मुआवजे की आधी राशि जमा किए जाने से संबंधित रसीद प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले में बस चालक सहित अन्य पक्षकारों को दोबारा नोटिस जारी करने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।

अब आगे की कार्यवाही में यह महत्वपूर्ण होगा कि निर्धारित 30 दिनों की अवधि में अदालत की शर्तों का पालन किया जाता है या नहीं। मुआवजे की राशि जमा होने और आगे की सुनवाई के बाद ही मामले की अगली स्थिति स्पष्ट होगी।

कानूनी आदेश के बाद भी राहत का इंतजार क्यों?

यह मामला सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार के लिए मुआवजे की अहमियत को सामने लाता है। किसी परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद आर्थिक सहायता केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि परिवार की आजीविका और भविष्य से भी जुड़ी होती है।

मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा मुआवजा निर्धारित किए जाने के बावजूद यदि राशि समय पर नहीं मिलती, तो प्रभावित परिवार को वास्तविक राहत के लिए अतिरिक्त इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसे में हाईकोर्ट की ओर से अपीलकर्ता पक्ष पर खर्च लगाने और मुआवजे की आधी राशि जमा करने की शर्त रखने को इस मामले की महत्वपूर्ण कार्यवाही माना जा रहा है।

फिलहाल, हाईकोर्ट ने अपील में हुई देरी माफ कर सुनवाई का रास्ता खोला है, लेकिन मुआवजे के भुगतान से जुड़ी शर्तें भी तय की हैं। इसे पूरे मुआवजे के भुगतान या अपील के अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मृतक के परिजनों को पूरी राशि कब मिलेगी, यह आगे की न्यायिक कार्यवाही और अदालत के निर्देशों के अनुपालन पर निर्भर करेगा।