रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code- UCC) को लेकर हलचल तेज हो गई है। राज्य में प्रस्तावित यूसीसी के प्रारूप में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए जाने की चर्चा है। यदि प्रस्तावित व्यवस्था कानून का रूप लेती है तो लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले युवक-युवतियों को अपने रिश्ते की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करानी पड़ सकती है। इतना ही नहीं, यदि दोनों में से कोई एक या दोनों अलग होने का फैसला करते हैं, तो इसकी सूचना भी संबंधित रजिस्ट्रार को देना अनिवार्य हो सकता है।

प्रस्तावित व्यवस्था में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों के अधिकारों को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत रिश्ता समाप्त होने की स्थिति में महिला साथी को गुजारा भत्ता दिलाने तथा ऐसे संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने का प्रस्ताव है। बच्चों को पिता की पैतृक संपत्ति में भी समान अधिकार देने की बात सामने आई है।

लिव-इन में रहने से लेकर अलग होने तक दर्ज करानी होगी जानकारी

प्रस्तावित यूसीसी ड्राफ्ट में लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी दायरे में लाने की तैयारी की जा रही है। इसके तहत साथ रहने का निर्णय लेने वाले जोड़ों को संबंधित सरकारी रजिस्ट्रार के समक्ष अपने संबंध का पंजीकरण कराना पड़ सकता है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य लिव-इन संबंधों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार करना और ऐसे संबंधों से जुड़े कानूनी विवादों को व्यवस्थित तरीके से निपटाना बताया जा रहा है।

प्रस्तावित प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई युवक या युवती इस रिश्ते से बाहर निकलना चाहता है तो संबंध समाप्त करने की सूचना भी रजिस्ट्रार कार्यालय में दर्ज करानी पड़ सकती है। इसकी जानकारी दूसरे साथी को भी भेजे जाने का प्रावधान विचाराधीन है।

रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित नियमों का पालन नहीं करने पर जुर्माने और कारावास जैसे दंडात्मक प्रावधानों पर भी विचार किया जा रहा है। हालांकि, इन प्रावधानों का अंतिम स्वरूप समिति की रिपोर्ट और सरकार के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।

रिश्ता टूटने पर महिला को मिल सकता है गुजारा भत्ता

लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े प्रस्तावों में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। यदि संबंध समाप्त होने के बाद महिला आर्थिक परेशानी का सामना करती है तो उसे गुजारा भत्ता दिलाने की व्यवस्था प्रस्तावित है।

इसके लिए महिला को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन करने की सुविधा दिए जाने की बात सामने आई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लंबे समय तक साथ रहने के बाद रिश्ता समाप्त होने की स्थिति में महिला को आर्थिक असुरक्षा का सामना न करना पड़े।

लिव-इन से जन्मे बच्चों को वैध संतान का दर्जा, पैतृक संपत्ति में भी अधिकार

प्रस्तावित यूसीसी में बच्चों के अधिकारों को लेकर भी अहम बदलाव की तैयारी है। लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान का दर्जा देने का प्रस्ताव सामने आया है।

इसके साथ ही ऐसे बच्चों को पिता की पैतृक संपत्ति में अन्य संतानों के समान अधिकार देने की बात भी शामिल है। इसका उद्देश्य माता-पिता के रिश्ते की स्थिति से बच्चों के अधिकारों को प्रभावित होने से बचाना है।

यदि यह प्रस्ताव अंतिम कानून में शामिल होता है तो लिव-इन संबंधों से जन्म लेने वाले बच्चों के उत्तराधिकार और संपत्ति संबंधी अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

विवाह और तलाक के लिए भी एक समान कानून की तैयारी

छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता केवल लिव-इन रिलेशनशिप तक सीमित नहीं है। समिति विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और दत्तक ग्रहण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी अध्ययन कर रही है।

प्रस्तावित व्यवस्था में सभी नागरिकों के लिए विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने और तलाक की प्रक्रिया में एकरूपता लाने जैसे विषय शामिल हैं।

अलग-अलग धर्मों और समुदायों में विवाह तथा तलाक से संबंधित मौजूदा व्यक्तिगत कानूनों का अध्ययन कर समान नागरिक संहिता के लिए एक साझा कानूनी ढांचा तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है।

30 नवंबर तक सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई समिति

छत्तीसगढ़ सरकार ने जून 2026 में समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करने के लिए पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई कर रही हैं।

समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी श्यामधर सिंह और एमके राउत, वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पवार तथा ज्योति रानी सिंह सदस्य के रूप में शामिल हैं।

समिति ने प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचकर आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों से चर्चा की है।

रायपुर, दुर्ग, अंबिकापुर, सूरजपुर सहित बस्तर संभाग के विभिन्न जिलों में जनसंवाद और सुझाव लेने की प्रक्रिया पूरी की गई है। ऑनलाइन, ई-मेल, डाक और प्रत्यक्ष माध्यमों से भी लोगों की राय मांगी गई थी।

रिपोर्टों के अनुसार, समिति को एक हजार से अधिक सुझाव और आपत्तियां प्राप्त हुई हैं। सुझाव भेजने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर निर्धारित थी। अब समिति इन सभी सुझावों और कानूनी पहलुओं का अध्ययन कर अंतिम रिपोर्ट तैयार कर रही है।

आदिवासी समाज की परंपराओं को सुरक्षित रखना भी बड़ी चुनौती

समान नागरिक संहिता को लेकर प्रदेश के आदिवासी अंचलों में भी कई तरह की चर्चाएं और चिंताएं सामने आई हैं। विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा क्षेत्र के आदिवासी समुदायों ने अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण को लेकर अपनी बात रखी है।

ऐसे में समिति के सामने चुनौती है कि समान नागरिक संहिता का प्रारूप तैयार करते समय आदिवासी समाज की विशिष्ट परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों का भी ध्यान रखा जाए।

दिसंबर के शीतकालीन सत्र में पेश हो सकता है UCC का ड्राफ्ट

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति 30 नवंबर 2026 तक अपनी अंतिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप सकती है। इसके बाद दिसंबर में प्रस्तावित विधानसभा के शीतकालीन सत्र में यूसीसी से संबंधित ड्राफ्ट या विधेयक पेश किए जाने की संभावना है।

हालांकि, रिपोर्ट सौंपने के बाद भी प्रस्तावों पर सरकार का निर्णय, विधायी प्रक्रिया और विधानसभा की मंजूरी आवश्यक होगी। इसके बाद ही कानून लागू होने की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

फिलहाल छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता लागू नहीं हुई है। लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण, गुजारा भत्ता और बच्चों के पैतृक संपत्ति में अधिकार से जुड़े ये प्रावधान अभी प्रस्तावित व्यवस्था का हिस्सा हैं। इन्हें लागू कानून मानना सही नहीं होगा।