बिलासपुर। जिले में शराब दुकानों के आसपास संचालित होने वाले चखना सेंटरों को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। कहीं चखना सेंटर के ठेके के लिए 70 लाख रुपये तक की बोली लगने की जानकारी सामने आई, तो कहीं 60 लाख रुपये तक का ठेका हुआ। लेकिन अब कई सेंटरों के बंद होने और शराब दुकानों के आसपास कथित अवैध चखना दुकानों के संचालन की शिकायतों ने आबकारी विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

66 ठेकों की नीलामी, अब कितने सेंटर चालू?

प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, बिलासपुर जिले की 64 और गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (जीपीएम) जिले की दो शराब दुकानों सहित कुल 66 चखना सेंटरों के लिए नीलामी प्रक्रिया हुई थी। इसमें बिलासपुर के तोरवा सेंटर के लिए 70 लाख रुपये और चुचुहियापारा के लिए 60 लाख रुपये तक की बोली लगने की जानकारी दी गई है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्तमान में बिलासपुर में लगभग 30 से 32 सेंटर ही संचालित होने की जानकारी सामने आ रही है। हालांकि, इन आंकड़ों की आधिकारिक पुष्टि और सभी बंद सेंटरों की स्थिति स्पष्ट होना अभी जरूरी है।

लाखों की बोली के बाद ठेके क्यों हुए बंद?

यदि किसी सेंटर के लिए लाखों रुपये की बोली लगी थी, तो उसके बंद होने की वजह क्या है? क्या संबंधित ठेकेदारों ने निर्धारित शर्तें पूरी नहीं कीं, क्या किसी ने ठेका सरेंडर किया या फिर संचालन बंद होने के पीछे कोई दूसरी वजह है?

इन सवालों का जवाब आबकारी विभाग के आधिकारिक आंकड़ों से ही मिल सकता है। विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितने ठेके वर्तमान में वैध हैं, कितने सेंटर बंद हो चुके हैं और कितने ठेकेदारों ने नियमानुसार ठेका छोड़ा है।

अवैध चखना दुकानों पर कार्रवाई का हिसाब कहां?

शराब दुकानों के आसपास कथित तौर पर अवैध चखना दुकानें संचालित होने और वसूली संबंधी शिकायतों का भी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है। ऐसे मामलों में यह जानना जरूरी है कि विभाग को कितनी शिकायतें मिलीं, कितने स्थानों की जांच की गई और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कितनी कार्रवाई हुई।

यदि अवैध संचालन की शिकायतें सही हैं, तो जिम्मेदार लोगों पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, यदि शिकायतें निराधार हैं, तो विभाग को तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

सहायक आबकारी आयुक्त की जवाबदेही पर भी सवाल

रिपोर्ट में सहायक आबकारी आयुक्त नवनीत तिवारी से संबंधित सवाल भी उठाए गए हैं। इसमें मीडियाकर्मियों को जानकारी नहीं मिलने, फोन रिसीव नहीं किए जाने और कार्यालय में मुलाकात नहीं हो पाने की शिकायतों का उल्लेख है। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारी का पक्ष और विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना भी जरूरी है।

यह मामला किसी व्यक्ति पर आरोप लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली सवाल यह है कि जिले में चखना सेंटरों के संचालन की निगरानी कैसे हो रही है और सरकारी राजस्व का पूरा हिसाब सार्वजनिक रूप से स्पष्ट क्यों नहीं है।

अगली नीलामी से पहले स्थिति स्पष्ट करना जरूरी

रिपोर्ट में मार्च 2027 में अगली नीलामी प्रस्तावित होने का उल्लेख किया गया है। ऐसे में उससे पहले मौजूदा ठेकों की स्थिति, बंद सेंटरों का विवरण, ठेका सरेंडर करने वालों की जानकारी और राजस्व से संबंधित आंकड़े स्पष्ट किए जाने चाहिए।

अब आबकारी विभाग से सीधे सवाल हैं: जिले में कितने चखना सेंटर वैध रूप से संचालित हैं? कितने बंद हैं? अवैध संचालन की शिकायतों पर कितनी कार्रवाई हुई? और ठेकों से संबंधित राजस्व का पूरा हिसाब क्या है?