उत्तराखंड। कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व देशभर में अलग-अलग परंपराओं और लोक मान्यताओं के साथ मनाया जाता है। लेकिन उत्तराखंड की पहाड़ियों में इस पर्व से जुड़ी एक ऐसी अनूठी परंपरा आज भी जीवित है, जो लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। करीब छह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रुपनौलसौड में जन्माष्टमी के अवसर पर रंगों की जगह दूध, ताजे मक्खन और छांछ की होली खेली जाती है।

प्राकृतिक खूबसूरती से घिरे रुपनौलसौड में कृष्ण जन्माष्टमी का यह आयोजन महज उत्सव नहीं, बल्कि पहाड़ी लोकजीवन, पशुपालन, लोक आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण माना जाता है। जन्माष्टमी के दिन यहां आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा और लोक संस्कृति के रंग में पहुंचते हैं।
आगामी 4 सितंबर को कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर एक बार फिर गंगा और यमुना घाटी के ग्रामीण रुपनौलसौड में जुटेंगे। इस दौरान पहाड़ी लोकगीतों और लोकनृत्य के बीच दूध, मक्खन और छांछ की होली खेली जाएगी। पूरा क्षेत्र इस अनूठे आयोजन के रंग में रंगा नजर आएगा।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगवान कृष्ण का बचपन गोपालन और दूध-दही-मक्खन से जुड़ा रहा है। इसी भाव को यहां की लोक परंपरा ने अपने अलग अंदाज में सहेजकर रखा है। जन्माष्टमी के दौरान दूध और मक्खन की होली के जरिए पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा भी जुड़ी मानी जाती है।
पहाड़ी क्षेत्रों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था लंबे समय से पशुपालन पर निर्भर रही है। गाय-बैल और अन्य मवेशी ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। दूध, दही, मक्खन और छांछ न केवल खान-पान का हिस्सा रहे, बल्कि स्थानीय जीवन और अर्थव्यवस्था से भी गहराई से जुड़े रहे हैं। ऐसे में जन्माष्टमी का यह आयोजन पशुधन के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की लोक भावना को भी प्रदर्शित करता है।
रुपनौलसौड में होने वाले इस आयोजन की एक खास बात यह भी है कि इसमें केवल स्थानीय ग्रामीण ही शामिल नहीं होते। गंगा घाटी के दशगी और भंडारस्यूं क्षेत्र के लोग यहां पहुंचते हैं, जबकि यमुना घाटी की मुंगरसंती और बड़कोट पट्टियों से भी बड़ी संख्या में ग्रामीण आयोजन में शामिल होते हैं।
दो अलग-अलग घाटियों से आने वाले ग्रामीणों का यह सांस्कृतिक मिलन जन्माष्टमी के उत्सव को और खास बना देता है। लोकगीतों, पारंपरिक नृत्य और सामूहिक उत्सव के बीच दूध, मक्खन और छांछ की होली यहां की लोक संस्कृति की अलग पहचान सामने लाती है।
रुपनौलसौड की पहचान केवल इस अनूठी जन्माष्टमी परंपरा तक सीमित नहीं है। करीब छह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पहाड़ी परिवेश के लिए भी जाना जाता है। यहां की लोक मान्यताओं में आच्छरी मातृयां यानी परियों से जुड़ी कथाएं भी प्रचलित हैं, जो इस स्थान को रहस्यमयी और सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट पहचान देती हैं।
यही वजह है कि रुपनौलसौड को केवल एक खूबसूरत पहाड़ी स्थल या बुग्याल के तौर पर नहीं देखा जाता। यह स्थान उत्तराखंड की लोक आस्था, पशुपालन की परंपरा, पौराणिक मान्यताओं और पहाड़ी संस्कृति के उस रूप को संजोए हुए है, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है।
कृष्ण जन्माष्टमी पर खेली जाने वाली दूध, मक्खन और छांछ की होली इसी जीवंत लोक परंपरा की मिसाल है। यहां भगवान कृष्ण के प्रति आस्था के साथ प्रकृति, पशुधन, लोकगीत और सामुदायिक भाईचारा एक ही उत्सव में दिखाई देता है। यही अनूठा संगम रुपनौलसौड की जन्माष्टमी को उत्तराखंड की दूसरी जगहों से अलग पहचान देता है।








