बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वर्ष 2011 के एक हत्या मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए प्रताप सिंह की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत न्यायाधीश को गवाहों से सवाल पूछने और आवश्यक तथ्यों को स्पष्ट करने का अधिकार जरूर है, लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष के मामले में मौजूद कमी को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों को संदेह से परे पर्याप्त नहीं मानते हुए प्रताप सिंह को बरी कर दिया। फैसला 24 सितंबर 2026 को सुनाया गया।

मामला 19 नवंबर 2011 का है। अभियोजन के अनुसार उमराज/उमराव गोंड और शिवनाथ तथा उसके बेटे प्रताप सिंह के बीच विवाद हुआ था। आरोप था कि विवाद के दौरान प्रताप सिंह और शिवनाथ ने बांस की लाठियों से उमराज/उमराव गोंड के साथ मारपीट की, जिसके बाद उसकी मौत हो गई। मामले में पुलिस ने प्रताप सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 34 के तहत आरोप लगाए थे।

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल आठ गवाह पेश किए गए। मुख्य गवाह सूरजवती गोंड के बयान को लेकर हाई कोर्ट ने गंभीर असंगतियां पाईं। उसके बयान से यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो पाया कि उसने घटना को किस तरह और किस स्थिति में देखा था। इसके अलावा कुछ अन्य गवाह भी अपने पूर्व बयानों से मुकर गए। कथित रूप से बरामद लाठियों के संबंध में पेश किए गए गवाहों ने भी अभियोजन के मामले का अपेक्षित समर्थन नहीं किया।

हाई कोर्ट ने मेडिकल साक्ष्य पर भी गौर किया। कोर्ट के अनुसार चिकित्सकीय साक्ष्य से किसी विशेष चोट को बरामद की गई लाठी से जोड़कर स्थापित नहीं किया जा सका। बरामद किए गए सामान पर मानव रक्त मिलने की बात भी अभियोजन के पक्ष को मजबूत करने के लिए सामने नहीं आई। ऐसे में घटना में प्रताप सिंह की भूमिका को स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करना अभियोजन के लिए कठिन रहा।

मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत पूछे गए सवालों को लेकर भी उठा। इस धारा के तहत न्यायाधीश को किसी प्रासंगिक तथ्य को सामने लाने के लिए गवाह से सवाल पूछने का व्यापक अधिकार दिया गया है। हालांकि हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार न्यायालय को अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए मामले की ऐसी कमी पूरी करने की अनुमति नहीं देता, जो साक्ष्यों से स्वयं साबित नहीं हुई हो।

हाई कोर्ट के अनुसार ट्रायल कोर्ट की पूछताछ के दौरान प्रताप सिंह द्वारा मृतक को गर्दन पर चोट मारने से संबंधित एक महत्वपूर्ण जवाब सामने आया था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि यह बात गवाह के पहले दिए गए बयान से लगातार और स्पष्ट रूप से समर्थित नहीं थी तथा अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों से भी इसकी पर्याप्त पुष्टि नहीं हुई थी। हाई कोर्ट ने माना कि इस तरह की पूछताछ अभियोजन के मामले में मौजूद महत्वपूर्ण कड़ी को पूरा करने के समान हो गई थी।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया। इनमें यह सिद्धांत सामने आया है कि न्यायाधीश का काम निष्पक्ष रहकर साक्ष्यों को स्पष्ट करना है, न कि किसी एक पक्ष के मामले में मौजूद कमियों को दूर करने के लिए स्वयं अभियोजन की भूमिका ग्रहण करना। हाई कोर्ट ने इसी आधार पर धारा 165 के इस्तेमाल की सीमा को रेखांकित किया।

इस मामले में प्रताप सिंह के साथ सह-आरोपी बनाए गए उसके पिता शिवनाथ को ट्रायल कोर्ट पहले ही बरी कर चुका था। हाई कोर्ट ने इस पहलू पर भी विचार किया और कहा कि जब दोनों के खिलाफ साक्ष्य का आधार और कथित भूमिका काफी हद तक समान थी, तो प्रताप सिंह को दोषी ठहराने के लिए स्पष्ट और कानूनी रूप से टिकाऊ अंतर होना आवश्यक था। अभियोजन ऐसा अंतर स्थापित नहीं कर सका।

ट्रायल कोर्ट ने प्रताप सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग-1 के तहत दोषी ठहराते हुए पांच वर्ष के सश्रम कारावास और एक लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाई कोर्ट ने अब उस दोषसिद्धि और सजा के आदेश को निरस्त कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रताप सिंह की भूमिका को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा।

हाई कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए प्रताप सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। चूंकि वह पहले से जमानत पर था, अदालत ने उसके जमानत बांड को लागू रखने का निर्देश भी दिया।

यह फैसला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि न्यायालय के पास गवाहों से सवाल पूछकर तथ्यों को स्पष्ट करने की शक्ति होने के बावजूद उस शक्ति का इस्तेमाल अभियोजन के ऐसे तथ्य या कड़ी को स्थापित करने के लिए नहीं किया जा सकता, जिसे अभियोजन अपने स्वतंत्र साक्ष्यों से साबित नहीं कर पाया हो।