बिलासपुर। गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय बिलासपुर की करीब 5 एकड़ जमीन एक निजी संस्था/समाज को आवंटित किए जाने के कथित प्रस्ताव को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। मामले में विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक और उसमें लिए गए निर्णय को लेकर राष्ट्रपति एवं शासन स्तर पर शिकायत की गई है। शिकायतकर्ता रूपेश दिवाकर ने कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल की अध्यक्षता में हुई स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में लिए गए निर्णय को निरस्त करने तथा संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

शिकायत में उल्लेख किया गया है कि विभिन्न माध्यमों एवं दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर जानकारी सामने आई कि 2 अगस्त को कुलपति प्रो. आलोक कुमार चक्रवाल की अध्यक्षता में स्टैंडिंग कमेटी की बैठक आयोजित हुई थी। शिकायत के अनुसार बैठक में एजेंडा क्रमांक 7 के तहत अखिल भारतीय अघरिया समाज सम्मेलन, छत्तीसगढ़ प्रांतीय इकाई की मांग पर विश्वविद्यालय परिसर की करीब 5 एकड़ जमीन दिए जाने का प्रस्ताव रखा गया और उसे कथित तौर पर पारित कर दिया गया।

सरकारी जमीन निजी संस्था को देने पर सवाल

शिकायतकर्ता का कहना है कि गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय सरकारी विश्वविद्यालय है और उसके पास उपलब्ध जमीन सार्वजनिक संपत्ति है। ऐसे में किसी विशेष जाति, धर्म अथवा सामाजिक संस्था को विश्वविद्यालय की जमीन आवंटित किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि विश्वविद्यालय की जमीन का उपयोग शिक्षा, विद्यार्थियों तथा शैक्षणिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, कौशल एवं खेल गतिविधियों के लिए किया जाना चाहिए। इसे किसी निजी संस्था या समाज को दिए जाने के प्रस्ताव पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।

राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग

राष्ट्रपति को संबोधित शिकायत में मांग की गई है कि कुलपति की अध्यक्षता में हुई स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में 5 एकड़ जमीन आवंटित करने संबंधी प्रस्ताव को तत्काल निरस्त किया जाए। साथ ही बैठक में मौजूद अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने की मांग की गई है।

शिकायतकर्ता ने कहा है कि यदि निर्णय निरस्त नहीं किया गया तो लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन कर इसका विरोध किया जाएगा।

जमीन आवंटन की प्रक्रिया पर जांच की मांग

मामले में अब मुख्य सवाल विश्वविद्यालय की जमीन के स्वामित्व, उसके उपयोग और किसी संस्था को आवंटित करने की प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है। शिकायत में इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और यह स्पष्ट करने की मांग की गई है कि आखिर किस नियम के तहत विश्वविद्यालय परिसर की जमीन को किसी सामाजिक संस्था को देने का प्रस्ताव तैयार किया गया।

फिलहाल शिकायत सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रबंधन और संबंधित उच्चाधिकारियों की ओर से इस मामले में क्या कदम उठाया जाता है, इस पर नजरें टिकी हैं। शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और प्रस्ताव की वैधानिक स्थिति संबंधित सक्षम प्राधिकारी की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।