रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां महामाया मंदिर में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर निभाई जाने वाली एक अनूठी धार्मिक परंपरा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां नवरात्रि की पहली ज्योत आधुनिक साधनों से नहीं, बल्कि चकमक पत्थरों से अग्नि उत्पन्न कर प्रज्वलित की जाती है। इस परंपरा में एक कुंवारी कन्या की विशेष भूमिका होती है।

चकमक पत्थरों से प्रज्वलित होती है पहली ज्योत

मां महामाया मंदिर में वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के अनुसार, नवरात्रि की शुरुआत पर 10 वर्ष से कम उम्र की कुंवारी कन्या चकमक पत्थरों की सहायता से अग्नि उत्पन्न करती है। इसी अग्नि से नवरात्रि की पहली ज्योत प्रज्वलित की जाती है।

आज के आधुनिक दौर में, जब आग जलाने के लिए कई तरह के साधन उपलब्ध हैं, तब पारंपरिक तरीके से पहली ज्योत प्रज्वलित करने की यह परंपरा भारतीय धार्मिक संस्कृति और प्राचीन रीति-रिवाजों की याद दिलाती है।

आस्था और परंपरा का अनूठा संगम

शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिरों में घटस्थापना, अखंड ज्योत, आरती और विशेष अनुष्ठानों के साथ देवी की आराधना होती है।

मां महामाया मंदिर की यह परंपरा इसलिए भी खास है, क्योंकि इसमें पुरातन विधि से अग्नि उत्पन्न कर देवी के पूजन की शुरुआत की जाती है। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।

नवरात्रि पर मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना

शारदीय नवरात्रि के दौरान छत्तीसगढ़ के विभिन्न देवी मंदिरों में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। श्रद्धालु मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। इस दौरान विशेष पूजा, आरती और ज्योति प्रज्वलन जैसे अनुष्ठान धार्मिक वातावरण को और भक्तिमय बना देते हैं।

मां महामाया मंदिर की चकमक पत्थरों से पहली ज्योत प्रज्वलित करने की परंपरा छत्तीसगढ़ की धार्मिक विरासत की एक विशिष्ट पहचान है, जो आधुनिक समय में भी प्राचीन रीति-रिवाजों के महत्व को दर्शाती है।