छत्तीसगढ़ सिर्फ भारत का एक अपेक्षाकृत नया राज्य नहीं है। इसके पीछे हजारों वर्षों की सभ्यता, अनेक राजवंशों, आदिवासी परंपराओं, धार्मिक-सांस्कृतिक आंदोलनों, रियासतों, औपनिवेशिक संघर्षों और अलग राज्य की लंबी राजनीतिक मांग की कहानी है।

1 नवंबर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ भारत का 26वां राज्य बना, लेकिन जिस भूभाग को आज हम छत्तीसगढ़ कहते हैं उसकी ऐतिहासिक पहचान इससे कई सदियों पुरानी है।

प्राचीन काल में छत्तीसगढ़: दक्षिण कोसल की भूमि

प्राचीन समय में वर्तमान छत्तीसगढ़ का बड़ा हिस्सा दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में इस क्षेत्र का उल्लेख अलग-अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों में मिलता है।

महानदी और उसकी सहायक नदियों से सिंचित यह भूभाग प्राचीन काल से ही कृषि, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। पुरातात्विक अवशेषों से भी इस क्षेत्र में प्राचीन बस्तियों और सांस्कृतिक गतिविधियों की पुष्टि होती है।

छत्तीसगढ़ के इतिहास में मल्हार, सिरपुर, राजिम और रतनपुर जैसे स्थानों का विशेष महत्व है। सरगुजा और बस्तर क्षेत्र में भी प्राचीन संस्कृति और जनजातीय परंपराओं के लंबे इतिहास के प्रमाण मिलते हैं।

मौर्य, सातवाहन, वाकाटक और गुप्त प्रभाव

छत्तीसगढ़ का इतिहास किसी एक स्थानीय राजवंश तक सीमित नहीं रहा। अलग-अलग समय में इस क्षेत्र पर या इसके आसपास के क्षेत्रों पर मौर्य, सातवाहन, वाकाटक और गुप्त जैसी बड़ी शक्तियों का प्रभाव रहा।

इतिहास के अध्ययन में छत्तीसगढ़ के प्राचीन राजनीतिक इतिहास के अंतर्गत इन राजवंशों के साथ-साथ राजर्षितुल्य, शरभपुरीय, पाण्डुवंशी, नल और अन्य क्षेत्रीय राजवंशों का भी उल्लेख मिलता है।

इन राजवंशों के दौर में धार्मिक संस्थाओं, मंदिरों, व्यापारिक गतिविधियों और स्थानीय प्रशासन का विकास हुआ।

सिरपुर: प्राचीन छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक केंद्र

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास की बात हो और सिरपुर का उल्लेख न हो, ऐसा संभव नहीं।

महानदी के किनारे स्थित सिरपुर प्राचीन काल में दक्षिण कोसल का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था। यहां बौद्ध, शैव और वैष्णव परंपराओं से जुड़े पुरातात्विक अवशेष मिले हैं।

सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर सहित अनेक पुरातात्विक अवशेष इस क्षेत्र की स्थापत्य और सांस्कृतिक समृद्धि की कहानी बताते हैं।

इस कारण सिरपुर को आज छत्तीसगढ़ की प्राचीन सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता है।

शरभपुरीय और पाण्डुवंशी राजवंश

प्राचीन दक्षिण कोसल के राजनीतिक इतिहास में शरभपुरीय और बाद में पाण्डुवंशी शासकों का महत्वपूर्ण स्थान रहा।

इन राजवंशों के शासनकाल में धार्मिक गतिविधियों और मंदिर निर्माण को बढ़ावा मिला। सिरपुर विशेष रूप से पाण्डुवंशी काल में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा।

महाशिवगुप्त बालार्जुन का नाम इस दौर से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। उनके समय में सिरपुर की सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का व्यापक विकास हुआ।

छत्तीसगढ़ में बस्तर की अलग ऐतिहासिक धारा

छत्तीसगढ़ के इतिहास को केवल रायपुर, बिलासपुर और रतनपुर के आसपास की कहानी मानना अधूरा होगा।

बस्तर की अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा रही है। यहां नागवंशी और बाद में छिंदकनाग तथा काकतीय परंपराओं से जुड़े राजवंशों का प्रभाव रहा।

बस्तर की राजनीति के साथ-साथ यहां की जनजातीय सामाजिक व्यवस्था, जंगल, भूमि और स्थानीय परंपराओं ने क्षेत्र की पहचान को अलग रूप दिया।

यही कारण है कि आधुनिक छत्तीसगढ़ की पहचान में बस्तर की जनजातीय संस्कृति का बहुत बड़ा योगदान है।

कलचुरी राजवंश और रतनपुर

मध्यकालीन छत्तीसगढ़ के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण नामों में से एक है कलचुरी राजवंश।

रतनपुर इस राजवंश का प्रमुख केंद्र बना। छत्तीसगढ़ के इतिहास में रतनपुर का महत्व इसी कारण बहुत बढ़ गया।

कलचुरियों के शासनकाल में प्रशासन, मंदिर निर्माण, कृषि व्यवस्था और स्थानीय राजनीतिक संरचना का विकास हुआ। रतनपुर और उसके आसपास आज भी इस काल की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत दिखाई देती है।

छत्तीसगढ़ के इतिहास से जुड़े सरकारी स्रोत भी रतनपुर के हैहय/कलचुरी शासन को राज्य की ऐतिहासिक पहचान के प्रमुख आधारों में रखते हैं।

“छत्तीसगढ़” नाम कहां से आया?

“छत्तीसगढ़” नाम को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग मत मिलते हैं।

सबसे प्रचलित मत के अनुसार यह नाम 36 गढ़ों से जुड़ा है। हैहय-कलचुरी शासन के प्रभाव वाले क्षेत्र में 36 प्रमुख गढ़ों की परंपरा से “छत्तीसगढ़” नाम के प्रचलन की व्याख्या की जाती है।

एक सरकारी ऐतिहासिक स्रोत भी “छत्तीसगढ़” को “छत्तीस किले” से जोड़ता है और इसे रतनपुर के हैहय वंश के क्षेत्र से संबंधित बताता है।

हालांकि नामकरण के इतिहास में अन्य मत भी मौजूद हैं। इसलिए “छत्तीसगढ़ का नाम केवल 36 किलों के कारण ही पड़ा” कहना इतिहास की जटिलता को जरूरत से ज्यादा सरल बना देना होगा।

मराठा शासन: 18वीं सदी का बड़ा बदलाव

18वीं सदी में छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन आया।

1741 के आसपास मराठा शक्ति का प्रभाव इस क्षेत्र में स्थापित हुआ और कलचुरी शासन की पुरानी राजनीतिक संरचना कमजोर पड़ गई।

मराठा शासन के दौरान प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था में बदलाव हुए। रायपुर का महत्व भी इस दौरान तेजी से बढ़ा। सरकारी प्रकाशनों में 18वीं सदी में रायपुर के मराठा नियंत्रण में आने और उसके बाद इसके प्रशासनिक तथा व्यापारिक महत्व बढ़ने का उल्लेख मिलता है।

धान और अन्य कृषि उपज के कारण यह क्षेत्र व्यापार के लिए भी महत्वपूर्ण बना रहा।

ब्रिटिश शासन की शुरुआत

मराठा शक्ति के कमजोर होने के बाद ब्रिटिश प्रभाव छत्तीसगढ़ में बढ़ा।

ब्रिटिश प्रशासन के दौर में इस क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े परिवर्तन हुए। रायपुर धीरे-धीरे महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र बन गया।

ब्रिटिश शासन के दौरान वर्तमान छत्तीसगढ़ का बड़ा हिस्सा विभिन्न रियासतों, जमींदारियों और ब्रिटिश प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित था। बाद में यह क्षेत्र ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक संरचना का हिस्सा बना।

1857 का विद्रोह और वीर नारायण सिंह

छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में शहीद वीर नारायण सिंह का नाम सबसे प्रमुख है।

सोनाखान क्षेत्र में अकाल के समय उन्होंने गरीब लोगों की स्थिति को देखते हुए अनाज उपलब्ध कराया और ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया।

1857 के विद्रोह के दौरान उनका संघर्ष छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का महत्वपूर्ण अध्याय बना।

उन्हें 10 दिसंबर 1857 को रायपुर में फांसी दी गई। छत्तीसगढ़ शासन के जनसंपर्क स्रोत उन्हें 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के प्रमुख सेनानी के रूप में याद करते हैं।

जनजातीय प्रतिरोध की लंबी परंपरा

छत्तीसगढ़ का स्वतंत्रता और प्रतिरोध का इतिहास केवल 1857 तक सीमित नहीं था।

आदिवासी समाज ने भूमि, जंगल, परंपराओं और स्थानीय स्वायत्तता पर बढ़ते बाहरी नियंत्रण के खिलाफ अलग-अलग समय में संघर्ष किए।

बस्तर क्षेत्र में 1910 का भूमकाल विद्रोह इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।

भूमकाल आंदोलन का नेतृत्व गुंडाधुर जैसे जनजातीय नेताओं ने किया। ब्रिटिश नीतियों, कर व्यवस्था, जबरन श्रम और पारंपरिक वन अधिकारों पर हस्तक्षेप के खिलाफ यह एक बड़ा जनजातीय प्रतिरोध बना।

भूमकाल आज भी छत्तीसगढ़ की जनजातीय अस्मिता और प्रतिरोध की सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटनाओं में गिना जाता है।

गुरु घासीदास और सामाजिक जागरण

छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास में गुरु घासीदास का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने सतनाम पंथ के माध्यम से सामाजिक समानता, मानवता और नैतिक जीवन का संदेश दिया। उनके विचारों ने छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्से में सामाजिक चेतना को प्रभावित किया।

सारंगढ़-बिलाईगढ़ क्षेत्र में स्थित कोसीर के आसपास के क्षेत्र को गुरु घासीदास की ज्ञानस्थली से जोड़ा जाता है और यह क्षेत्र सतनामी परंपरा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

उनकी परंपरा से जुड़ा पंथी नृत्य आज छत्तीसगढ़ की प्रमुख सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। छत्तीसगढ़ के SCERT पाठ्यक्रम में भी पंथी को सतनामी समुदाय की परंपरा और गुरु घासीदास से जुड़ी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।

स्वतंत्रता आंदोलन और छत्तीसगढ़

20वीं सदी में राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव छत्तीसगढ़ तक पहुंचा।

रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, धमतरी, राजनांदगांव और अन्य क्षेत्रों में राजनीतिक जागरण बढ़ा।

किसानों, मजदूरों, आदिवासियों और सामाजिक संगठनों ने ब्रिटिश शासन और स्थानीय शोषणकारी व्यवस्थाओं के खिलाफ अलग-अलग रूपों में आवाज उठाई।

इस दौर में पत्रकारिता और सामाजिक संगठनों ने भी राजनीतिक चेतना फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रियासतों का दौर

आज के छत्तीसगढ़ के भूभाग में स्वतंत्रता से पहले कई रियासतें और जमींदारियां थीं।

बस्तर, कांकेर, कवर्धा, सरगुजा, रायगढ़, सारंगढ़ और अन्य क्षेत्रों की अपनी-अपनी राजपरंपराएं थीं।

ब्रिटिश काल में इनमें से कई रियासतें अप्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण के अधीन थीं, जबकि स्थानीय राजपरिवार अपने आंतरिक प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

स्वतंत्रता के बाद इन रियासतों का भारतीय संघ में विलय हुआ और धीरे-धीरे आधुनिक प्रशासनिक ढांचा विकसित हुआ।

स्वतंत्र भारत में मध्यप्रदेश का हिस्सा

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद छत्तीसगढ़ का क्षेत्र स्वतंत्र भारत की नई प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल हुआ।

1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह क्षेत्र मध्यप्रदेश का हिस्सा बन गया।

इसके बाद कई दशकों तक छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा रहा, लेकिन अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे मजबूत होती गई।

अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग

अलग छत्तीसगढ़ राज्य की मांग का आधार सिर्फ राजनीतिक नहीं था।इसके पीछे कई कारण थे:

अलग सांस्कृतिक पहचान

छत्तीसगढ़ी भाषा और लोक परंपराएं

आदिवासी और ग्रामीण समाज की विशिष्ट परिस्थितियां

भौगोलिक दूरी

प्रशासनिक सुविधा

क्षेत्रीय विकास की मांग

प्राकृतिक संसाधनों के स्थानीय उपयोग की अपेक्षा

अलग राज्य की मांग की जड़ें 20वीं सदी के शुरुआती दौर में दिखाई देती हैं, जबकि 1970 के दशक के बाद यह आंदोलन अधिक स्पष्ट राजनीतिक रूप लेने लगा। 1990 के दशक में अलग राज्य का मुद्दा और मजबूत हुआ।

2000: छत्तीसगढ़ राज्य का जन्म

अलग राज्य की मांग को अंततः राजनीतिक स्वीकृति मिली।

भारतीय संसद ने मध्यप्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 पारित किया और इसके बाद 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ आधिकारिक रूप से अलग राज्य बन गया।

रायपुर को राजधानी बनाया गया।

छत्तीसगढ़ की पहली विधानसभा की पहली बैठक 14 दिसंबर 2000 को हुई।

इसी के साथ दक्षिण कोसल, कलचुरी, मराठा, ब्रिटिश, रियासतों और मध्यप्रदेश के लंबे ऐतिहासिक दौर से गुजरता यह क्षेत्र एक स्वतंत्र राज्य के रूप में नई राजनीतिक यात्रा पर निकल पड़ा।

नए राज्य से आधुनिक छत्तीसगढ़ तक

राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ ने अपनी प्रशासनिक संरचना का विस्तार किया।

नए जिलों और संभागों का गठन हुआ। राज्य बनने के समय 16 जिले थे। बाद के वर्षों में प्रशासनिक सुविधा के लिए लगातार नए जिले बनाए गए। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2022 में पांच नए जिले बनने के बाद राज्य में जिलों की संख्या बढ़कर 33 हुई।

राज्य ने कृषि, खनिज, बिजली, इस्पात, सीमेंट और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई।

भिलाई इस्पात संयंत्र ने औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिज संसाधनों ने छत्तीसगढ़ को भारत के प्रमुख खनिज-समृद्ध राज्यों में स्थान दिलाया।

छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ खनिजों से नहीं

छत्तीसगढ़ को केवल खनिज और उद्योगों के आधार पर समझना भी अधूरा होगा।

यह राज्य अपनी:

छत्तीसगढ़ी भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य, पंथी, राउत नाचा, सुआ, करमा, आदिवासी परंपराओं, बस्तर की कला, ढोकरा शिल्प, कोसा वस्त्र, कृषि संस्कृति और समृद्ध लोक जीवन

के लिए भी जाना जाता है।

यही सांस्कृतिक निरंतरता प्राचीन दक्षिण कोसल से लेकर आधुनिक छत्तीसगढ़ तक इस क्षेत्र की सबसे मजबूत पहचान है।

निष्कर्ष: हजारों साल की यात्रा, एक आधुनिक पहचान

छत्तीसगढ़ का इतिहास किसी एक राजवंश या एक तारीख की कहानी नहीं है।

यह प्राचीन दक्षिण कोसल की सभ्यता से शुरू होकर शरभपुरीय और पाण्डुवंशी परंपराओं, बस्तर के राजवंशों, कलचुरियों के रतनपुर, मराठा शासन, ब्रिटिश सत्ता, वीर नारायण सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों, भूमकाल जैसे जनजातीय विद्रोहों, गुरु घासीदास जैसे सामाजिक सुधारकों और अंततः अलग राज्य के आंदोलन से गुजरता हुआ आधुनिक छत्तीसगढ़ तक पहुंचता है।

1 नवंबर 2000 को राज्य का गठन इस लंबी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत था।

आज का छत्तीसगढ़ अपने इतिहास, संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और जनजातीय विरासत के साथ भारत के महत्वपूर्ण राज्यों में अपनी अलग पहचान बना चुका है।

छत्तीसगढ़ का इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है—यह उन लोगों का इतिहास भी है जिन्होंने जंगल, जमीन, संस्कृति, सामाजिक सम्मान और अपनी पहचान के लिए पीढ़ियों तक संघर्ष किया।