बिलासपुर। आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए लागू शिक्षा का अधिकार यानी RTE योजना के बावजूद बिलासपुर जिले में बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गईं। हैरानी की बात यह है कि जहां एक ओर जरूरतमंद परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों की फीस चुका रहे हैं, वहीं दूसरी ओर RTE के तहत उपलब्ध सैकड़ों सीटों पर प्रवेश नहीं हो सका।

मौजूदा सत्र में बिलासपुर जिले के निजी स्कूलों में RTE के तहत कुल 2215 सीटें निर्धारित की गई थीं। इनमें से 1704 सीटों पर ही प्रवेश हो सका, जबकि 511 सीटें रिक्त रह गईं। दो चरणों के बाद तीसरा और अंतिम चरण भी आयोजित किया गया, लेकिन इसके बाद भी सभी सीटें नहीं भर सकीं।

प्रदेश स्तर पर भी तस्वीर बहुत अलग नहीं रही। इस बार छत्तीसगढ़ में RTE के तहत 23,097 सीटों पर प्रवेश होना था, लेकिन अंतिम प्रक्रिया तक करीब 16,541 सीटों पर ही प्रवेश हो सका। रायपुर, दुर्ग और मुंगेली सहित कई जिलों में भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गईं।

RTE के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रहती हैं। योजना का उद्देश्य ऐसे बच्चों को निजी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अवसर देना है। इसके बावजूद सीटों का रिक्त रह जाना अब व्यवस्था और अभिभावकों की प्राथमिकताओं दोनों पर सवाल खड़े कर रहा है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण वजह के तौर पर अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को लेकर अभिभावकों की प्राथमिकता सामने आ रही है। कई अभिभावक RTE के तहत आवेदन तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी पहली पसंद अंग्रेजी माध्यम के प्रतिष्ठित निजी स्कूल हैं। मनपसंद स्कूल में सीट नहीं मिलने पर वे हिंदी माध्यम के उपलब्ध स्कूलों में प्रवेश लेने के बजाय निजी स्कूल की फीस देकर बच्चे को पढ़ाना पसंद कर रहे हैं।

एक स्थानीय अभिभावक ने बताया कि RTE में आवेदन करने का मुख्य उद्देश्य बच्चे को अच्छे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ाना था। मनचाहे स्कूल में सीट नहीं मिलने के बाद परिवार ने दूसरे विकल्प पर विचार किया, लेकिन हिंदी माध्यम में बच्चे को पढ़ाने की इच्छा नहीं होने के कारण अब निजी स्कूल की फीस देकर पढ़ाई कराई जा रही है।

इसी तरह एक अन्य स्थानीय अभिभावक का कहना है कि RTE के तहत सीट मिलने की उम्मीद थी, लेकिन पसंद का अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं मिल पाया। परिवार आगे की पढ़ाई भी अंग्रेजी माध्यम से कराने के पक्ष में है। ऐसे में RTE के बजाय निजी स्कूल की फीस भरना मजबूरी बन गया।

एक अन्य स्थानीय अभिभावक ने बताया कि RTE का लाभ लेने के लिए केवल अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में आवेदन किया गया था। मनपसंद स्कूल में प्रवेश नहीं मिलने के बाद परिवार ने हिंदी माध्यम का विकल्प स्वीकार नहीं किया और अब निजी स्कूल में फीस देकर बच्चे की पढ़ाई कराई जा रही है।

अधिकारियों के अनुसार, RTE की सीटें खाली रहने के पीछे एक वजह यह भी है कि किसी क्षेत्र के कुछ निजी स्कूलों में आवेदन अधिक संख्या में पहुंच जाते हैं, जबकि दूसरे स्कूलों में अपेक्षाकृत कम आवेदन आते हैं। इससे कुछ स्कूलों की सीटें भर जाती हैं, जबकि अन्य स्कूलों में सीटें खाली रह जाती हैं।

हालांकि, बिलासपुर में 511 सीटों का खाली रह जाना अपने आप में बड़ा सवाल है। एक तरफ RTE के तहत बच्चों को निजी स्कूलों में निःशुल्क पढ़ाई का अधिकार दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कई परिवार पसंद के स्कूल या माध्यम की वजह से इस सुविधा का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

अब सवाल यह है कि क्या RTE की प्रवेश प्रक्रिया में अभिभावकों को स्कूल और माध्यम के विकल्प पर्याप्त रूप से मिल पा रहे हैं? क्या उपलब्ध सीटों और अभिभावकों की पसंद के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है? और सबसे अहम, जिन बच्चों के लिए RTE जैसी योजना बनाई गई है, क्या उसका पूरा लाभ वास्तव में उन्हीं तक पहुंच पा रहा है?

बिलासपुर में 511 सीटों का खाली रह जाना इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत बताता है। आने वाले सत्र में यदि रिक्त सीटों की संख्या कम करनी है तो अभिभावकों की प्राथमिकता, स्कूलों की उपलब्धता और प्रवेश प्रक्रिया के बीच बेहतर समन्वय बनाना चुनौती