बिलासपुर। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के अंतर्गत संचालित अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान परियोजना से बिलासपुर के कृषि वैज्ञानिकों ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय एवं क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, बिलासपुर के वैज्ञानिकों ने गेहूं की नई बायोफोर्टिफाइड किस्म CG 1047, जिसे 'छत्तीसगढ़ ट्रॉम्बे कुमुद' नाम दिया गया है, विकसित की है।

इस नई किस्म की पहचान अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान परियोजना की 65वीं कार्यशाला में की गई। कार्यशाला 18 से 20 अगस्त 2026 तक राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर में आयोजित हुई थी।

CG 1047 को करीब दस वर्षों के सतत अनुसंधान के बाद विकसित किया गया है।

इसके विकास में गेहूं वैज्ञानिक डॉ. अजय प्रकाश अग्रवाल का महत्वपूर्ण योगदान रहा। अनुसंधान के दौरान भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों का भी सहयोग मिला और ट्रॉम्बे, मुंबई में किस्म की सूक्ष्म विशेषताओं का परीक्षण किया गया।

इस किस्म को मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में अधिसिंचित परिस्थितियों में गेहूं की खेती को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है।

CG 1047 की सबसे खास विशेषता इसका बायोफोर्टिफाइड होना है। इसमें करीब 41.7 पीपीएम आयरन, 41.7 पीपीएम जिंक और 12 प्रतिशत से अधिक प्रोटीन पाया गया है। इस वजह से इसे उत्पादन के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण किस्म माना जा रहा है।

गुणवत्ता परीक्षण में इस किस्म का चपाती मेकिंग स्कोर 8.0/10 और बिस्किट स्प्रेडिंग फैक्टर 8.7/10 दर्ज किया गया है। इससे चपाती के साथ बिस्किट निर्माण के लिए भी बेहतर कच्चा माल मिलने की संभावना है।

नई किस्म की एक और खासियत कम सिंचाई में उत्पादन देने की क्षमता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2 से 3 सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी CG 1047 अच्छी उत्पादकता दे सकती है। अधिसिंचित परिस्थितियों में इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 36.7 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है। समय पर बुवाई और बेहतर कृषि प्रबंधन के साथ इसकी उत्पादन क्षमता और बढ़ने की संभावना बताई गई है।

CG 1047 का पैरेंट HW 2004/PSS 725 है। इसकी औसत पौध ऊंचाई करीब 85 से 90 सेंटीमीटर, 1000 दानों का वजन लगभग 41.5 ग्राम और फसल अवधि 107 से 110 दिन है। इसके दानों का रंग अम्बर यानी गेहुआं बताया गया है।

CG 1047 की आधिकारिक किस्म पहचान अखिल भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान परियोजना की 65वीं कार्यशाला में हुई। किस्म पहचान संबंधी प्रमाण-पत्र भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट से डॉ. दिनेश पाण्डेय, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख अन्वेषक (एक्रीप व्हीट) तथा डॉ. अवनीत कुमार, वैज्ञानिक (आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन) ने प्राप्त किया।

इस उपलब्धि के पीछे इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल के दिशा-निर्देशन, संचालक अनुसंधान डॉ. विवेक त्रिपाठी के मार्गदर्शन और क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र बिलासपुर के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार वर्मा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम का योगदान रहा।

बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर के अधिष्ठाता डॉ. एन.के. चौरे का भी निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। परियोजना में डॉ. एस.के. सिन्हा, डॉ. सुनील नाग, डॉ. डी.जे. शर्मा और तकनीकी सहायक माधुरी ग्रेस मिंज सहित अन्य वैज्ञानिकों एवं कर्मचारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा।

बिलासपुर के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि गेहूं की उत्पादकता के साथ उसकी पोषण गुणवत्ता और कम सिंचाई में बेहतर उत्पादन पर जोर देने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।