बिलासपुर। जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय बिलासपुर में 17 जून 2021 को सहायक ग्रेड-03 से सहायक ग्रेड-02 के पद पर हुई करीब 30 विभागीय कर्मचारियों की पदोन्नति का मामला छह साल बाद एक बार फिर सुर्खियों में है। शिक्षक संजय कुमार पाण्डेय ने लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई), रायपुर के संचालक को शिकायत भेजकर इन पदोन्नतियों की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। शिकायत में पदोन्नति प्रक्रिया में नियमों के कथित उल्लंघन के साथ-साथ वेतन भुगतान में भी गंभीर अनियमितता के आरोप लगाए गए हैं।

शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2021 में की गई इन पदोन्नतियों में वरिष्ठता, योग्यता, निर्धारित अर्हता, आरक्षण रोस्टर और विभागीय पदोन्नति समिति की प्रक्रिया से जुड़े नियमों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने पदोन्नति से संबंधित मूल दस्तावेजों की स्वतंत्र स्तर पर जांच कराने की मांग की है।

मामले में सबसे गंभीर आरोप वेतन भुगतान को लेकर है। शिकायत में दावा किया गया है कि सहायक ग्रेड-02 के पद पर पदोन्नत किए गए कर्मचारियों का वेतन कथित तौर पर ग्रंथपाल संवर्ग के स्वीकृत पदों के बजट मद से निकाला जा रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि यह व्यवस्था अभी भी जारी है।

यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल पदोन्नति प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी बजट के इस्तेमाल और वित्तीय नियमों के पालन से भी जुड़ सकता है। इसी वजह से शिकायत में पिछले वर्षों में हुए वेतन भुगतान की भी जांच कर शासन को हुई कथित वित्तीय क्षति का साल-दर-साल आकलन कराने की मांग की गई है।

शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया है कि इस मामले की विभागीय जांच लोक शिक्षण संचालनालय स्तर पर पहले भी हो चुकी है। शिकायत के मुताबिक, उस जांच में संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आई थी। इसके बावजूद कथित रूप से न तो पदोन्नतियां निरस्त हुईं और न ही जिम्मेदार लोगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई हुई।

यहीं से मामले में एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—यदि पहले की जांच में जिम्मेदारी तय हुई थी तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि पूर्व जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए थे तो उस जांच की रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकाला गया था? इन सवालों का जवाब विभागीय रिकॉर्ड और जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

शिकायत में डीपीआई से वर्ष 2021 की पदोन्नति से संबंधित आदेश, कर्मचारियों की सेवा पुस्तिकाएं, वरिष्ठता सूची, आरक्षण रोस्टर, विभागीय पदोन्नति समिति की कार्यवाही और वेतन भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की गई है।

इसके साथ ही शिकायतकर्ता ने नियम विरुद्ध पदोन्नति प्रमाणित होने की स्थिति में पदोन्नति आदेश निरस्त करने, कथित तौर पर गलत बजट मद से वेतन भुगतान की व्यवस्था रोकने और शासन को हुई वित्तीय क्षति का आकलन कर जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों से वसूली की कार्रवाई करने की मांग की है।

शिकायत में पूर्व जांच के दौरान कथित रूप से गलत या अधूरी रिपोर्ट प्रस्तुत कर जिम्मेदार लोगों को बचाने की भूमिका की भी जांच किए जाने की मांग की गई है।

हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों का पक्ष भी सामने नहीं आया है। इसलिए फिलहाल इन आरोपों को शिकायतकर्ता के दावों के रूप में ही देखा जा रहा है। वास्तविक स्थिति पदोन्नति से जुड़े मूल दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड और विभागीय जांच रिपोर्ट की पड़ताल के बाद ही स्पष्ट होगी।

छह साल पुराने इस मामले की शिकायत एक बार फिर डीपीआई तक पहुंचने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि विभाग पुराने रिकॉर्ड को खंगालकर पूरे मामले की वास्तविकता सामने लाता है या फिर यह शिकायत भी सरकारी फाइलों के बीच दबकर रह जाती है।