बिलासपुर। दुर्ग जिले के उतई थाना क्षेत्र में जमीन, क्रशर प्लांट और मशीनरी से जुड़े करीब 4.39 करोड़ रुपये के कथित लेन-देन के मामले में बिलासपुर हाई कोर्ट ने कांग्रेस पार्षद रीता सिंह और उनके परिवार को फिलहाल राहत नहीं दी है। हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आते हैं। ऐसे में जांच के शुरुआती चरण में FIR को रद्द कर जांच रोकना उचित नहीं होगा।
मामले में भिलाई की कांग्रेस पार्षद रीता सिंह, उनके पति रमेशचंद्र सिंह और बेटे मानव चंद्र सिंह के खिलाफ बीबी सिंह की शिकायत पर उतई थाने में FIR दर्ज की गई थी। शिकायत के मुताबिक विवाद जमीन, क्रशर प्लांट, मशीनरी और उनसे जुड़े भुगतान को लेकर है। बताया गया है कि FIR कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज की गई थी।
2008 में खरीदी गई जमीनों को लेकर विवाद
हाई कोर्ट में दायर याचिका में याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि वर्ष 2008 में कुल 15 जमीन के टुकड़े खरीदे गए थे। इनमें से 7 जमीनों के पंजीकृत बिक्री विलेख कराए गए, जबकि बाकी 8 जमीनों को लेकर एग्रीमेंट के आधार पर कब्जा लेने का दावा किया गया।
याचिका के अनुसार, 29 फरवरी 2024 को जमीन, मशीनरी और क्रशर प्लांट से जुड़े विवाद को लेकर दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ था। इसके बाद संपत्ति का कब्जा सौंपे जाने की बात भी कही गई। हालांकि बाद में बिजली बिल, खनन से जुड़ी देनदारियों और भुगतान को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद बढ़ गया।
शिकायत में तीसरे पक्ष की जमीन और दस्तावेजों को लेकर आरोप
शिकायतकर्ता बीबी सिंह की ओर से आरोप लगाया गया कि समझौते में शामिल कुछ जमीनें तीसरे पक्ष से संबंधित थीं। कुछ जमीनें सरकारी लीज से जुड़ी होने तथा कुछ संपत्तियों पर याचिकाकर्ताओं के पास हस्तांतरण योग्य अधिकार नहीं होने का भी आरोप लगाया गया।
शिकायत में करीब 4.39 करोड़ रुपये के भुगतान, दस्तावेजों और हस्ताक्षरों के कथित गलत इस्तेमाल से जुड़े आरोप भी लगाए गए हैं। इन्हीं आरोपों के आधार पर उतई पुलिस ने FIR दर्ज की।
हाई कोर्ट ने जांच रोकने से किया इनकार
FIR के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के आरोप दिखाई देते हैं। इसलिए जांच के शुरुआती चरण में FIR को रद्द करना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी मामले में सिविल विवाद या सिविल मुकदमा लंबित होना अपने आप आपराधिक जांच पर रोक लगाने का आधार नहीं बनता। शिकायत में लगाए गए आरोप सही हैं या गलत, इसका निर्धारण जांच के बाद ही किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर इन तथ्यों का परीक्षण ट्रायल के दौरान भी किया जा सकता है।
जमीन से बैंक खातों तक होगी जांच
हाई कोर्ट के निर्देश के बाद अब पुलिस को मामले की व्यापक और निष्पक्ष जांच करनी होगी। जांच में जमीन के राजस्व रिकॉर्ड, पंजीयन दस्तावेज, सरकारी लीज से जुड़े रिकॉर्ड, खनन अनुमति, पावर ऑफ अटॉर्नी और बैंक खातों में हुए लेन-देन की पड़ताल की जाएगी।
इसके अलावा विवादित दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की भी जांच की जाएगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और जमीन, क्रशर प्लांट, मशीनरी तथा भुगतान से जुड़े लेन-देन किन परिस्थितियों में हुए।
फिलहाल आरोप साबित नहीं
हाई कोर्ट के फैसले का मतलब यह नहीं है कि पार्षद रीता सिंह या उनके परिवार के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। कोर्ट ने केवल यह माना है कि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के आरोप मौजूद हैं और इसलिए जांच को इस स्तर पर रोका नहीं जा सकता।
अब उतई पुलिस की जांच और उसके बाद सामने आने वाले तथ्यों से ही स्पष्ट होगा कि मामले में लगाए गए आरोपों की वास्तविकता क्या है।

