रायपुर। पूर्व महिला नक्सलियों के रैंप वॉक से जुड़ी प्रकाशित खबरों में पेशेवर मॉडल्स की तस्वीरों के कथित तौर पर गलत संदर्भ में इस्तेमाल किए जाने का मामला सामने आया है। कुछ न्यूज पोर्टल्स पर प्रकाशित तस्वीरों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या खबर में दिखाई गई तस्वीरें वास्तव में उसी घटना से संबंधित प्रतिभागियों की हैं, जिनका उल्लेख समाचार में किया गया है। मामले ने पेशेवर मॉडल्स की पहचान, प्रतिष्ठा और मीडिया में तस्वीरों के जिम्मेदार इस्तेमाल को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित स्वदेशी फैशन शो में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट चुकीं पूर्व महिला नक्सलियों ने पेशेवर मॉडल्स के साथ रैंप वॉक किया था। कोसा सिल्क और पारंपरिक हथकरघा परिधानों में आयोजित इस रैंप वॉक को हिंसा छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटने वाली महिलाओं के आत्मविश्वास और पुनर्वास की सकारात्मक मिसाल के तौर पर प्रस्तुत किया गया।
हालांकि, आयोजन से जुड़ी खबरों में प्रकाशित कुछ तस्वीरों को लेकर अब आपत्ति सामने आई है। यदि किसी पेशेवर मॉडल की तस्वीर को ऐसी खबर के साथ इस तरह प्रकाशित किया गया है कि पाठक उसे पूर्व महिला नक्सली समझ ले, तो यह संबंधित मॉडल की सार्वजनिक पहचान और पेशेवर छवि के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
तस्वीर से बन सकती है गलत पहचान
समाचार में तस्वीर का महत्व केवल दृश्य प्रस्तुति तक सीमित नहीं होता। आम पाठक खबर के साथ प्रकाशित तस्वीर को उसमें वर्णित व्यक्ति से जोड़कर देखता है। ऐसे में किसी असंबंधित मॉडल की तस्वीर यदि आत्मसमर्पण, नक्सलवाद और पुनर्वास जैसे संवेदनशील विषय वाली खबर के साथ प्रकाशित हो, तो उसके बारे में गलत धारणा बनने की आशंका रहती है।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि डिजिटल मीडिया में प्रकाशित तस्वीरें तेजी से सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप और अन्य प्लेटफॉर्म तक पहुंच जाती हैं। बाद में खबर में सुधार किए जाने के बावजूद पुरानी तस्वीर के स्क्रीनशॉट और साझा की गई पोस्ट लंबे समय तक इंटरनेट पर मौजूद रह सकते हैं।
मॉडल पूजा और अनुष्का ने जताई चिंता
इस पूरे मामले को लेकर पेशेवर मॉडल पूजा और अनुष्का ने भी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि मॉडलिंग के क्षेत्र में कलाकार वर्षों की मेहनत से अपनी पेशेवर पहचान बनाते हैं। ऐसे में किसी असंबंधित खबर के साथ उनकी तस्वीर गलत संदर्भ में प्रकाशित होने से लोगों के बीच उनके बारे में भ्रम पैदा हो सकता है।
पूजा ने तस्वीर और खबर के बीच सही संदर्भ बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि किसी संवेदनशील समाचार में तस्वीर प्रकाशित करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि तस्वीर में दिखाई दे रही महिला वास्तव में उसी घटना से संबंधित है।
वहीं अनुष्का ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तस्वीरों के तेजी से प्रसारित होने को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि एक बार गलत संदर्भ वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर पहुंच जाए तो बाद में उसे पूरी तरह हटाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
‘फाइल फोटो’ या ‘प्रतीकात्मक तस्वीर’ तो स्पष्ट हो उल्लेख
मीडिया विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी खबर में प्रतीकात्मक या फाइल फोटो का इस्तेमाल किया जाता है तो उसके साथ स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया जाना चाहिए। इससे पाठकों के बीच किसी व्यक्ति की गलत पहचान होने की संभावना कम होती है।
खासकर नक्सलवाद, आत्मसमर्पण और पुनर्वास जैसे संवेदनशील विषयों में फोटो की पहचान और कैप्शन का सत्यापन बेहद जरूरी है। किसी असंबंधित व्यक्ति की तस्वीर को खबर के मुख्य विषय से जोड़कर प्रस्तुत करना उसकी सामाजिक और पेशेवर छवि को प्रभावित कर सकता है।
अब संबंधित पोर्टल्स की भूमिका पर नजर
मामले के सामने आने के बाद अब नजर संबंधित न्यूज पोर्टल्स पर है। सवाल यह है कि प्रकाशित तस्वीरों के स्रोत और पहचान का सत्यापन किस स्तर पर किया गया था। यदि तस्वीर गलत संदर्भ में इस्तेमाल हुई है तो क्या संबंधित संस्थान उसकी समीक्षा कर सही तस्वीर अथवा स्पष्ट कैप्शन उपलब्ध कराएंगे?
पत्रकारिता में खबर की विश्वसनीयता केवल शब्दों से तय नहीं होती। तस्वीर, कैप्शन और खबर के बीच तथ्यात्मक सामंजस्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पूर्व महिला नक्सलियों का मुख्यधारा में लौटना और हथकरघा परिधानों के साथ रैंप पर उतरना एक महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश है। लेकिन इस सकारात्मक पहल की रिपोर्टिंग के दौरान यदि किसी पेशेवर मॉडल की तस्वीर गलत पहचान से जुड़ जाती है, तो उसकी प्रतिष्ठा पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

